अध्याय - 1

                                               अर्थ

 भैरव शब्द में भ य र व बीज अक्षर हैं और इनका सामान्य अर्थ निम्न
प्रकार हैं :-
भ = भय, भय करने वाला, भय हरण करने वाला, भयभीत करने वाला, भयभीत की रक्षा करने वाला, भूतनाथ, भूताध्यक्ष, भूतपति, भू का स्वामी, भू से
लेकर ब्रह्मलोक तक जो जीव या देव इत्यादि निवास करते हैं सभी का स्वामी, भूमि पर सर्वत्र विद्यमान, भूमि पर विचरण करते समय अपने पैरों से भूमि को स्पर्श न करने वाला आदि |

य = वायु मण्डल में विचरण करने वाला, वायु मण्डल (आकाश) में साधक को ले जाने वाला, अनेक प्रकार की ध्वनि करने वाला, अनेक प्रकार केबीजाक्षर, बीजध्वनि, मंत्र ध्वनि उत्पन्न करने वाला, यक्षरूप, समस्त दिशाओंको अपनी ध्वनि से भयभीत या कम्पायमान करा देने वाला ।

 र = अग्नि का अधिपति, अग्निदेव, समस्त पापों को भष्म कर देने वाला, त्रितापों को नष्ट करने वाला, समस्त नाड़ियों से अन्धकार को मिटाने वाला,
अज्ञान के अन्धकार को अग्नि के तेज से नष्ट करने वाला, अनेक जन्मों के कष्टों से निवृति दिलाने वाला,यज्ञ का स्वरूप, यज्ञ का फल देने वाला, यज्ञ
की सामिग्री समस्त देवों तक पहुँचाने वाला, त्रिगुणात्मक स्वरूप वाला, त्रिकोण में निवास करने वाला, कुण्डलिनी स्वरूप वाला, कुण्डलिनी योग का साक्षी एवं गुरू, नाभि केन्द्र की २४ नाडियों के माध्यम से योग प्रदान कराने वाला, नाभि सहित समस्त केन्द्र में व्याप्त वायु चक्रों के द्वारा विभिन्न योग
क्रियाएँ कराने वाला, रक्त वर्ण वाला, रूण्डों की माला धारण करने वाला, रौद्र रूप धारण करने वाला, अनेक प्रकार के रूप-रंग धारण कर श्मशान में
विचरण करने वाला, पैने या तीखे दांतो वाला ।

व = बालक रूप, स्फटिक के समान रंग वाला वर्ष का बालक, वायु की गति से भी ज्यादा तेज चलने वाला, दशों दिशाओं में निवास करने
वाला, सृष्टि के प्रथम बीजाक्षर के रूप में प्रकट हो कर व्यापक रूप से प्रकट होने वाला, वरूण देवता या वरूण देवता का साथी, विशालकाय, प्रलय रूपी
वायु को वहाने वाला, प्रलय हो जाने के उपरान्त भी वायु रूप में व्याप्त रहने वाला, ब्रह्मस्वरूप, बालक की तरह अनेक लीलाएँ करने वाला, इन चारों
बीजाक्षरों के अर्थ में सभी स्वरूपों का वर्णन मिल जाता है |

भैरव का रहने का स्थान :-

  1. बीहड़ जंगल :-    सात्विक – राजस एवं तमस रूपो  में सदैव विध्यमान रहते हैं । 
  2. श्मशान :- श्मशान किसी भी जाति, धर्म, समाज या देश का हो ।
  3. ग्रहस्थ:-   १. जिस घर में शिव / गायत्री की नित्य उपासना होती है
                   तथा जिनका आहार एवं व्यवहार शुद्ध सात्विक होता है | 
                  २. पूजा स्थल के समीप तुलसी का पौधा हो |   

भैरव की शक्ति:-

१. ईश्वर के किसी भी साकार स्वरूप के क्रिया करने की शक्ति ही भैरव शक्ति है ।
२. क्रिया के अनुरूप ही प्रतिक्रिया (फल) होता है अतः फल देने की शक्ति है ।
३. क्रिया से प्रतिक्रिया और प्रतिक्रिया से क्रिया आदि निरन्तर होती रहती है अतः अनवरत शक्ति है ।
४. प्रत्येक प्राणी के लिए जन्म एवं मृत्यु महत्वपूर्ण क्रियाएँ हैं अतः इन दोनो पर नियंत्रण इन्हीं का होता है अर्थात मृत्यु कब, कहाँ और कैसे होगी
मृत्यु के पश्चात तूक्ष्म शरीर की गति क्या होगी ? आदि |

यमराज, धर्मराज एवं चित्रगुप्त इन्हीं की शक्तियों से सम्वन्ध रखते हैं । (यमराज = मृत्यु को देने वाले, धर्मराज = पाप एवं पुन्य का विश्लेषण
करने वाले, चित्रगुप्त = पाप एवं पुन्य का लेखा रखने वाले होते हैं)  नित्य कर्म :- साधक अपना क्रम निम्न प्रकार से बना सकते हैं
नियंत्रण
9. यम – अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह
२. नियम – पवित्रता, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान ।
३.आसन – शुद्धस्थान, शुद्धवस्त्र, शुद्धशरीर, सुविधानुसार बैठे ।
४. प्राणायाम – पूरक, कुम्भक और रेचक का पूर्ण अभ्यास एवं
५. प्रत्याहार
६. धारणा कुण्डलिनी योग / समाधि की इच्छा रखने वाले

 ७. ध्यान साधकों के लिए है ।
८. समाधि का अभ्यास सुविधा –  अनुसार / अपने गुरू के  – आदेशानुसार करते हुए निम्न लिखित बातों पर विशेष ध्यान दें :-
(अ) प्रातः उठते ही अपनी दोनों हाथों को देखें, भूमि का स्पर्श करें।
(ब) उठते / सोते समय सुन्दर-सुन्दर श्लोकों का स्मरण ।
(स)रात्री को सोने से पूर्व एक गिलास दूध थोडी सी मिश्री व इलायची युक्त पीएँ ।
(द) प्रकाश के बिन्दु को उठते ही देखें व सोने से पूर्व दर्शन कर के सोए । यदि प्रकाश दिखाई नहीं देता है तो अपने इष्ट या गुरू
का दर्शन करने का प्रयास करें ।

विशेष लाभप्रद क्रियाएँ :

१. बीजाक्षर जागृत करने की क्रियाएँ,
२. सूक्ष्म शरीर जागृत करने की क्रियाएँ ।

बीजाक्षर क्रियाएँ :-

कुण्डलिनी योग में सात चक्रों का वर्णन आता है। प्रत्येक में बीजाक्षर होते हैं। इन चक्रों में तत्सम्बन्धी बीजाक्षरों का क्रमशः
जप करने से इन बीजाक्षरों की जागृति होती है ।

सूक्ष्म शरीर क्रियाएँ :- 

स्थूल शरीर को धारण करने वाला सूक्ष्म शरीर ही होता है। यह वायु रूप है तथा सम्बन्धित प्राणी के जन्मों के पाप-पुन्य
रूपी संस्कारों को अपने में संजोए रहता है। अतः इसका ज्ञान आवश्यक यह नाभि से ढाई अंगुल ऊपर स्थित नाडी से नियंत्रित किया जा सकता है।
हाकिनी इनको विशेष शक्ति प्रदान करती हैं। प्राणायाम के द्वारा नाभि की २४ नाडियों के माध्यम से शुद्ध प्राण के कण सूक्ष्म शरीर को पहुंचाएं जाते
हैं जिससे पाप के कण कम होते चले जाते है और व्यक्ति का अन्तःकरण प्रकाशित हो जाता है। वामकुक्षीय पाप पुरुष काले रंग का होता है तथा योग साधना में यह रूकावटें पैदा करता है ।

प्राण के कण (प्रकाश के कण) प्राण वायु से ही उत्पन्न होते हैं।
तथा वाय का अधिपति भैरव है । (देखे क्षेत्रपालाष्टक) इन प्राण कणों के घर्षण से ध्वनि उत्पन्न होती है। इस ध्वनि से ॐ या विभिन्न मंत्र / ऋचाएँ
बनती हैं ।

अतिविशिष्ट योग क्रियाएँ :-
१. अमृतपान क्रियाएँ.
२. कुण्डलिनी योग क्रियाएँ .
अमृतपान क्रियाएँ :– अमृत देवताओं के लिए होता है । अतः देव तुल्य (सात्विक) बनना ही पड़ेगा । खेचरी मुद्रा से अमृतपान किया जाता है।
कुण्डलिनी योग क्रियाएँ :– गुरू से सीखी जाती हैं। इस योग की अधिष्ठात्री देवी काली हैं । भैरव गुरू हैं ।

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