भूमिका
अग्नि पुराण के ५२ वें अध्याय में भैरव के स्वरुप का वर्णन किया गया है। शिवपुराण मे अनुसार भैरव की उत्पत्ति शिव के तृतीय नेत्र से मानीगई है । सृष्टि के क्रम में सर्वप्रथम कालभैरव की उत्पत्ति ब्रह्माजी के पंचमशिरच्छेदन के लिए हुई है ।भैरव को शिव का ही स्वरुप माना गया है । कुछ मतो में यह देवी
के पुत्र कहे गए हैं। वस्तुतः यह शिव स्वरुप हैं । बालक (बटुक) रुप मेंयह देवियों के विभिन्न स्वरूपों के साथ रहते हैं । पार्वती जी को शिव ने
बताया है कि यद्यपि भैरव के नाम एवं स्वरुप अनेक हैं किन्तु वास्तव में भैरव देव एक ही है और यह अगन्यास इत्यादि एवं स्त्रात के पाठ से शीघ्र प्रसन्न
होते हैं । योग की प्राप्ति के लिए जब भैरव की उपासना की जाती है तब इन्हें योगसिद्धराज भैरव कहा जाता है अन्यथा इन्हें बटुक कहा गया है।सत्व रज-तम स्वरुप बटुक भैरव के हैं तथा असंख्य रुप बटुक के ही हैं।
योगसिद्धराज महाराज की शक्ति केवल गायत्री या महागायत्री के साथही कार्य करती है ।गायत्री देवी एवं गायत्री मंत्र को विश्व जानता है। इनकी उपासना
जितनी सरल है उतनी ही कठिनता इनके दर्शन अथवा कृपा प्राप्ति में होती है । अर्थात सामान्य रुप से की गई साधना से प्रायः कुछ भी प्राप्त नहीं होता
है । इसलिए क्रुद्ध होकर कई ऋषियों ने गायत्री को श्राप भी दिया है विश्वामित्र जी का मत है कि “कोई भी प्राणी तप के द्वारा ईश्वर (गायत्री
या भैरव इत्यादि) से कुछ भी प्राप्त कर सकता है” रावण हो या अन्य ऋषि हों सभी को फल की प्राप्ति तप के द्वारा ही हुई । तप का अर्थ सामान्य क्रिया की तुलना में बहुत अधिक परिश्रम करना होता है । इस कमें कब तरीके सेवन करने का प्रयास किया गया है । चूँकि ध्येय योग की प्राप्ति है अतः वर्णन भ योगसिद्धराज महाराज का ही दिया गया है । योग के अतिरिक्त अन्यकर्मकाण्ड की क्रियाओं या साधना का वर्णन नहीं किया गया है क्योंकिदेव एक ही है और यह अगन्यास इत्यादि एवं स्त्रात के पाठ से शीघ्र प्रसन्नहोते हैं । योग की प्राप्ति के लिए जब भैरव की उपासना की जाती है तबइन्हें योगसिद्धराज भैरव कहा जाता है अन्यथा इन्हें बटुक कहा गया है।
सत्व रज-तम स्वरुप बटुक भैरव के हैं तथा असंख्य रुप बटुक के ही हैं।
योगसिद्धराज महाराज की शक्ति केवल गायत्री या महागायत्री के साथ
ही कार्य करती है । गायत्री देवी एवं गायत्री मंत्र को विश्व जानता है। इनकी उपासना जितनी सरल है उतनी ही कठिनता इनके दर्शन अथवा कृपा प्राप्ति में होती है । अर्थात सामान्य रुप से की गई साधना से प्रायः कुछ भी प्राप्त नहीं होता है । इसलिए क्रुद्ध होकर कई ऋषियों ने गायत्री को श्राप भी दिया है विश्वामित्र जी का मत है कि “कोई भी प्राणी तप के द्वारा ईश्वर (गायत्री या भैरव इत्यादि) से कुछ भी प्राप्त कर सकता है” रावण हो या अन्य ऋषि हों सभी को फल की प्राप्ति तप के द्वारा ही हुई ।
तप का अर्थ सामान्य क्रिया की तुलना में बहुत अधिक परिश्रमकरना होता है । । इस कमें कब तरीके सेवन करने का प्रयास किया गया है । चूँकि ध्येय योग की प्राप्ति है अतः वर्णन भी योगसिद्धराज महाराज का ही दिया गया है । योग के अतिरिक्त अन्यकर्मकाण्ड की क्रियाओं या साधना का वर्णन नहीं किया गया है । क्योंकि आत्म कल्याण के लिए बटुक का पूर्ण शुद्ध व सात्विक अथवा योगिक स्वरुप योगसिद्धराज ही है ।भैरव की प्रसन्नता न्यास आदि के साथ स्तोत्र पाठ एवं सामान्य दीपदान से ही हो जाती है। इनके मंत्र का जाप स्तोत्र पाठ के साथ करें तो वहुत लाभकारी होता है मां काली, दुर्गा, बगलादेवी की उपासना के साथ साथ यंत्रों का प्रयोग करने के लिए भी वर्णन किया गया है। यंत्र में मंत्र के प्रयोग से तंत्र उत्पन्न होता है तथा इन तीनो के नियमानुसार पूजन श्रद्धा एवं विश्वास से करने पर देव साक्षात्कार होता है। देव के साक्षात्कार होने पर श्रद्धा एवं परिश्रम में उत्तरोत्तर वृद्धि होना स्वाभाविक है और योग में अधिक परिश्रम ही
अग्रिम चरण में तप बन जाता है।और तप से ईश्वर का साक्षात्कार होता है। योग का समस्त क्रियाओं का विस्तृत विवरण इस पुस्तक में नहीं है,
संकेत मात्र ही बताई गई हैं। योग / कुण्डलिनी योग एवं भैरव के साधकइस पुष्तक से अवश्य लाभ ग्रहण करेगें ऐसी प्रभू से प्रार्थना है।
आभार – श्री स्वामी जी महाराज दतिया
डा० ज्ञान सिंह
ई – 40 सैक्टर न0 13
मालवीय नगर, जयपुर – 17
e mail- jal_singh@hotmail.com
site – www.kundalinisadhana.com
निवेदक
डा० जल सिंह
शिव रात्री
सम्वत 2057
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निवेदक डा० जल सिंह शिव रात्री सम्वत 2057
