अध्याय - 5

योग में भैरव उपासना

किसी भी शक्ति का साक्षात्कार अत्यधिक प्रेम या अत्यधिक घणा से
होता है । भक्त का प्रेम ओर राक्षसों की घणा इसके उदाहरण हैं ।
जीवात्मा के प्रकाश का परमात्मा के प्रकाश में लय हो जाना योग हैं ।

योग की प्राप्ति के लिए अनेक क्रियाओं का होना आवश्यक है तथा
क्रियाओं की सफलता केवल गुरु ही कराते हैं । गुरु का सामान्य अर्थ ज्ञान
कराने वाला या अन्धकार को मिटाकर प्रकाश जाग्रत कराने वाला होता हैं
जो कि अन्त (पराकाष्ठा) में अपने परमब्रह्म स्वरुप में लय कर लेता हैं।

उपासना में साधक ईश्वर के किसी भी स्वरुप अथवा गुरु के समीप बैठ कर भक्ति या क्रियाओं का अभ्यास करता हैं ।
यहा पर अनन्य भक्ति अथवा समर्पण ही मुख्य आधार माना गया है।
भैरव की कृपा प्राप्त करने के लिए निम्न लिखित कार्य किया जाना आवश्यक
हैं ।
१. नित्य कर्म – जो कि पूर्व में बताये गए हैं ।
२. नैमित्तिक कर्म – शिवताण्डव स्तोत्र, क्षेत्रपालाष्टक, शिवमहिम्न
स्तोत्र का पाठ ।
किसी भी देव में लय होने से पूर्व यह समझना आवश्यक है कि:-
१ – देव कृपा की प्राप्ति,
२ – देव का साक्षात्कार,
३ – देव का सामीप्य आदि अलग अलग अवस्थाऐं हैं और योग में
इन तीनों ही स्थितियों का ज्ञान होना आवश्यक हैं । क्रमशः –
देव कृपा की प्राप्ति :- किसी भी देव को अपनी ओर आकर्षित करने 

के लिए साधक का उनके प्रति मोह, आकर्षण, समर्पण, भक्ति या उनके स्वरुप को जानने की जिज्ञासा होनी चाहिए । अर्थात भैरव देव के प्रति
समर्पण एवं भक्ति आवश्यक हैं।
समर्पण और भक्ति वस्तुतः एक दूसरे के पूरक हैं तथा साधक की आवश्यकता के अनुसार होते हैं । योग की प्राप्ति (मोक्ष) के लिए निम्न कार्य
करें :-
१. पूर्व में बताएं गए स्तोत्र आदि का पाठ (प्रतिदिन)
२.दीपदान
३.यंत्र पूजन
४. मंत्र जप
५. तदुपरान्त तंत्र साधन ।
भैरव यंत्र :- दो यंत्र विशेष महत्व के हैं –
१. देवदत्त
२. भैरव शक्ति यंत्र

इन यंत्रो की पूजा में विभिन्न मंत्रों का प्रयोग किया जाता हैं। मुख्यतः यह
दो हैं ।
१. भैरव मंत्र,
२. गायत्री मंत्र । भैरव के मंत्रों का प्रयोग उनके आसन (यंत्र) पर
किया जाता है ताकि भैरव की शक्ति (गुरु) अपने शिष्य (जीवात्मा) को परम
पद (गायत्री) में लय कर दें ।
यंत्र में विभिन्न मंत्रों का विधिवत प्रयोग ही तंत्र होता हैं।
यह दो प्रकार से होता हैं ।
१. बाह्य – कर्मकाण्ड के द्वारा
२. आन्तरिक – योग के द्वारा
कर्मकाण्ड के द्वारा :- उपरोक्त यंत्र की पूजाविधि, विस्तृत वर्णन
अनेक पस्तकों में मिल जाता है ।

अपने गुरु की पद्धति से यह कार्य सम्पादित किया जाता है ।
आन्तरिक साधना :- इस पुस्तक का मुख्य विषय है और बहुत
ही महत्वपूर्ण है । क्योंकि बाह्य पूजा से पुण्यादि की प्राप्ति होती है और
साधक को विभिन्न शक्तियों का साक्षात्कार या ज्ञान होता है। फलतः साधक
आन्तरिक साधना की ओर आकर्षित कम होता है । पथभ्रष्ट हो जाना भी
सम्भव है। अतः आन्तरिक साधना अर्थात योग साधना की विधि ही भली
प्रकार से समझने का प्रयास करने के पश्चात ही प्रयोग में लाना चाहिए
इस कार्य को पूरा करने के लिए निम्न लिखित क्रियाओं का ज्ञान होना
आवश्यक है :-

१. प्राणायाम
२. नाडियों का ज्ञान
३. कुण्डलिनी उत्थान
४. सूक्ष्म शरीर का ज्ञान

५. मंत्र – (1) भैरव

(2) गायत्री (चतुष्पदा)
(3) हंस गायत्री 

प्राणायम में साधक अपने को इतना पारंगत करले कि वह अपने
प्राण मूलाधार में स्थित त्रिकोण के बिन्दु तक पहुंचादे ताकि वहाँ पर
विराजमान कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत कर ब्रह्मनाडी के माध्यम से सातों
चक्रों का भेदन कर सहस्त्रार के मध्य बिन्दु, कर्णिका पर पहुँच जाए । अर्थात
योग की प्राप्ति के लिए सहस्त्रार आदि का ज्ञान आवश्यक माना गया हैं।
मूलाधार :- यह मूल आधार हैं योग की प्राप्ति के लिए अर्थात
क्रियाओं का आरम्भ इसी स्थान से होता है । अतः गुरु का यहां होना
आवश्यक हैं। गुरु अर्थात भैरव की उपस्थिति यहां सात्विक रुप में होती
है । इनका सात्विक स्वरुप वस्तुतः दो प्रकार का है :-

१. दो भुजा,
२. बारह भुजा ।

दो भुजा का वर्णन सामान्यतय पुस्तकों में  मिल जाता है किन्तु वास्तविक रुप बारह भुजा का ही होता है । भैरव देव कुण्डलिनी शक्ति को
जाग्रत कराने में साधक की सहायता प्राणायाम के माध्यम से करते है तथा
साधक अपनी एकाग्रता में किए गए गायत्री या ऊँकार जप से अर्थात मंत्र
की टंकोर से कुण्डलिनी के दर्शन कर उनकी पूँछ पर जोर से टंकोर मारता
है। इससे कुण्डलिनी जाग्रत हो जाती है ।
जाग्रत होते ही कुण्डलिनी का मुख ऊपर उठता है । इसी समय
इनके मुख को ब्रह्मनाडी में रखदेना आवश्यक है ताकि कुण्डलिनी का
उत्थान ही हो । अन्यथा अधोमुख हो जाने से साधक को पाताल आदि
लोकों की प्राप्ति होना अवश्यम्भावी है । कुण्डलिनी के मुख को ब्रह्मनाडी
में रखने की प्रक्रिया को केवल भैरव ही कर सकते हैं कोई अन्य देव नहीं।
इसीलिए योग में भैरव की उपासना का महत्व है। अर्थात योग के
गुरु यही है। 

नाडी:- मूलाधार में ईडा – पिंगला सुषुम्ना होती हैं । सुषुम्ना
में चित्रा वज्रा और ब्रह्मनाड़ी होती है। ब्रह्मनाड़ी चक्रों ही सभी चक्रों का केन्द्र बिन्दु बन कर चमकती है तथा सहस्त्रार में शिव पार्वती का आसन बन जाती
है । नाडियों में जब प्राणायाम के द्वारा प्राणों का संचार किया जाता है तो यह खुल जाती हैं अन्यथा कुण्डलिनी के मुख से निकलती हुई अग्नि की
ज्वालाओं से नाडियों में प्राणों का संचार स्वतः ही हो जाता है ।
ब्रह्मनाडी में जब कुण्डलिनी विचरण करती हैं तब इनकी जिव्हा
लपलपाती है तथा अग्नि की ज्वालाऐं निकलती हैं। अर्थात इस समय शरीर
में अत्यधिक ताप हो जाता हैं । यदि साधना ठीक प्रकार से की जा रही है
तो सहस्त्रार की प्राप्ति अवश्य होगी अन्यथा शरीर में कहीं न कहीं बिकार
उत्पन्न हो जाऐगा । पूरी क्रिया में कहीं भी असुविधा या त्रुटि को केवल भैरव
ही बचा सकते हैं । अर्थात भैरव की कृपा आवश्यक है ।
कुण्डलिनी का ब्रह्मनाडी में विचरण करने का स्वरुप वस्तुतः काली
मां का स्वरुप है । काली मां का आसन शिव हैं । (शिवारूढां हैं) क्योकि
काली मां के पैरों के नीचे शिव ही इनकी (कुण्डलिनी की अधोगति को रोक
सकते हैं। अतः इस अवस्था में पूर्णता के लिए शिवारुढा काली की भक्ति की   जाती हैं। अर्थात  यह इस योग की अधिष्ठात्री देवी है |

मूलाधार से सहस्त्रार तक की साधना में साधक को गुरु कृपा की
अनुभूति तो अवश्य होती है किन्तु दर्शन यदा-कदा ही होते हैं ।
सहस्त्रार:- यह स्थान है शिव और पार्वती का तथा तत्सम्बन्धित
देव शक्तियों के स्वरूपों के साक्षात्कार करने का यहां सर्वाधिक महत्व
बीजाक्षर युक्त मंत्रो का होता है । जैस ऊँ, क्राँ क्रीं क्रू के क्रौं क्रः, भ्रां
श्रीं भ्रू भैरवाय नमः, सः सूर्याय नमः इत्यादि । भगवान शिव और पार्वती
सहस्त्रार के मध्यबिन्दु पर आसन लगाए हुऐ विराजमान है । कभी दृश्य
होता है कैलाश का और कभी अपने समस्त गणों सहित भैरव रुप में ।
अर्थात भैरव का स्वरुप यहां स्पष्ट हो जाता है ।

 भैरव के दर्शन क्रमशः –
प्रथम – तामस रुप अर्थात कालभैरव अष्टभुजा,
द्वितीय – राजस रुप अर्थात स्वर्णाकर्षण भैरव,
तृतीय – सात्विक रुप अर्थात दो भुजा या १२ भुजारुप में होते है |

तदुपरान्त क्रम बदल जाता है तथा पुनः सात्विक से राजस और

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