ॐ करकलितकपालः कुण्डलीदण्डपाणिः ।
            तरुणतिमिरनीलव्यालयज्ञोपवीती ।।

         क्रतुसमयसपार्याविघ्नविच्छेद हेतु र्जयति ।
        बटुकनाथः सिद्धिदः साधकानाम् ।।

    परिचय प्रदान करने में यह  महत्ति भूमिका निर्वहन करगा । इसके आतारक्त
    शोधार्थियों हेतु भी यह तंत्र व मंत्र के क्षेत्र में नये क्षितिजों का उ‌द्घाटन
    करने में समर्थ होगा ।
    गई है ।
           किवन्दन्ति है कि शक्ति सिद्धि कि पूर्व भैरव की उपासना आवश्यक
     होती है। भक्ति भाव से प्रसन्न ही भैरव ही शक्ति स्वरुपादेवी का साक्षात्कार
     कराने में सहयोगी सिद्ध होते है ।
   प्रस्तुत पुस्तक में ‘गागर में सागर’ की लोकोक्ति को चरितार्थ किया
    है। इसमें जहाँ योग व भैरव की चर्चा है वहाँ “महा भैरव” के  वर्णन के साथ
    योग सिद्ध यंत्र भी दिये गये है । इतना ही नहीं इसमें सात विशिष्ट मंत्रों
का उल्लेख भी किया गया है। इस ग्रन्थ की विशेषता यह है कि इसमें भैरव
की आराधना की विस्तृत व्याख्या के साथ माँ काली, बगलामुखी देवी व शिव
की भी व्याखा विस्तार पूर्वक की गई है। हंडस गायत्री का भी इसमें समावेश
है। पन्द्रह अध्यायों में विभक्त यह आराधना ग्रन्थ जहाँ भक्ति मार्ग के पथिकों
के लिये आकाँक्षा आपूर्ति में सहायक होगा वहाँ भैरव के तान्त्रिक स्वरुप का
ज्योतिष महामहोपाध्याय

पं. प्रहलादराय व्यास
“साहित्य सुधाकर”
(राजस्थान सरकार द्वारा पुरस्कृत लेखक)

” गणेश कृपा
3/339, मालवीयानगर
जयपुर-17
“योग में भैरव उपासना” ग्रन्थ हिन्दी साहित्य में सर्व प्रथम प्रयोग
है ।

संस्कृत वाड़मय और तान्त्रिक साहित्य में भैरव साधना व उपासना के
कतिपय प्रकरण सुलभ हैं किन्तु हिन्दी भाषा-भाषियों के लिए जो भैरव सिद्धि
के आकांक्षी हैं यह प्रथम प्रामाणिक ग्रन्थ है जिसमें भैरव के बावन स्वरूपों
का वर्णन किया गया है और इसके अतिरिक्त भैरव सहस्त्रनामावली भी दीऐसे उपयोगी ग्रन्थ के सुधि लेखक डा. जलसिंह के इस सार्थक
प्रयास की मैं भूरि भूरि प्रशंसा करता हूँ और विश्वास करता हूँ कि यह ग्रन्थ
पाठको के विशाल समूह द्वारा समाद्रित होगा ।


“गणेश कृपा”
3/339, मालवीयानगर
जयपुर-17
शिवरात्रि
सम्वत 2057 वि.
ज्योतिष महामहोपाध्याय
प. प्रहलादराय व्यास “साहित्यधाकर”

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