अध्याय - 3
भैरव के 52 स्वरुप
भगवान भैरव के सहस्त्रों नाम व रूप हैं । किन्तु प्रचलन में निम्न
५०+२ = ५२ हैं । जिनका सम्बन्ध बीजाक्षरों से भी किया जा सकता हैं।
इन्हे क्षेत्रपाल भी कहा गया हैं |
भैरव की उत्पत्ति का प्रकरण ब्रह्मा जी के पंचम शिरच्छेदन से
सम्बन्धित है । भैरव तथा रूद्र की उत्पत्ति का प्रसंग श्रीमदमहाभागवत पुराण
के सृष्टि विषयक अध्याय में आता है । काल भैरव की उत्पत्ति सर्वप्रथम मानी
जाती है । इनका सम्बन्ध मृत्यु व दण्ड आदि से रखा गया है
अग्निपुराण के ५२ वें अध्याय में भैरव के स्वरुप का वर्णन किया
गया है। इस स्वरुप में बारह हाथ हैं तथा आयुधों के नाम बताये गए हैं।
यह स्वरुप सामान्य स्वरूपों का एकीकृत रुप है। इस स्वरुप के ही सहस्त्रों
रुप आवश्यकता के अनुसार विकसित होते रहते हैं। यह स्वरुप पूर्णरूप से
सत्व, रज एवं तमोगुण प्रधान है अर्थात इस स्वरुप में ब्रह्मा, विष्णु और महेश
की शक्ति विराजमान है। यह स्वरुप त्रिगुंणात्मक, त्रिदैविक होने के कारण
ही परमब्रह्म का स्वरुप बन जाता है तथा योगीयों के लिए गुरु स्वरुप यही
होता है ।
वेद में एक के लिए बताया गया है ।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरु साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ।।
इस मंत्र का वास्तविक, तात्विक अर्थ निकालने का प्रयास करने पर
जो स्वरुप प्रकट होता है वह भगवान भैरव का ही बनता है । किसी अन्य
देवी या देवता का नहीं ।
भैरव का सर्वाधिक सम्पर्क दो शक्तियों से रहता है ।
१. महागायत्री
२. आदिसूर्य
महागायत्री :- महागायत्री का वर्णन देवी पुराण में आता है ।
इनके अनन्तरुप और अनन्त शक्तियां हैं। मां के सभी रुप स्वरुप शक्तियों
के साथ एक भैरव रुपी शक्ति अवश्य होती है । इनका नामकरण कार्यानुसार
होता है। जैसे काली के साथ काल या महाकाल इत्यादि ।
भैरव की शक्ति भैरवी होती है । भैरवी का रुप पार्वती का होता है।
पार्वती शिव की अर्घागिनी या शक्ति भी हैं । देव की शक्ति और उनकी पत्नी
में अन्तर होता है। जैसे – (१) सूर्य की शक्ति गायत्री हैं । पत्नी – सूर्याणी
कहलाती हैं। (२) भैरव की शक्ति भैरवी हैं किन्तु पत्नी ६४ योगिनियां हैं ।
महागायत्री की शक्ति से प्रथम स्वरुप जो उत्पन्न हुऐ हैं वह हैं :-
१. दुर्गा,
२. सरस्वती,
३. गायत्री,
४. राधा,
५. गरुतमुखी ।
यह पांचों शक्तियां अपने कार्यों का सम्पादन भैरव के माध्यम से
करती हैं। अर्थात भैरव एक माध्यम है महागायत्री एवं अन्य देव या देव
शक्ति के बीच । किन्तु भैरव के अन्य रुप तत्सम्बन्धी देव शक्तियों का कार्य
पूर्ण करते है । जैसे दुर्गा के साथ बटुक । देव सेना में होते हैं – बटुक,
हनुमान एवं दुर्गा ।
महागायत्री के पास भैरव का पूर्ण सात्विक स्वरुप ही होता है । अतः
यह शक्ति ही योग देने वाला होती है। पूर्व में कहा गया है कि भैरव एक
माध्यम शक्ति हैं अतः यह साधक एवं महागायत्री के बीच में एक सेतु का कार्य भी करते हैं। अतः गुरु हैं । कल्याणकारक हैं
इनकी कृपा को प्राप्त करने के लिए स्तुति पाठ,दीपदान, सहस्त्रनाम
पाठ इत्यादि होते हैं। किन्तु गायत्री मंत्र जपना अत्यन्त आवश्यक माना
गया है । गायत्री मंत्र का प्रयोग दीपदान में भी किया जाता है। दीपदान
करने वाले जानते है कि भैरव का एक नाम देवीपुत्र भी है ।
सूर्य:- सूर्य गृह एवं सूर्य देव अलग-अलग हैं । अनेक ब्रह्माण्डों
में सूर्य हैं तथा इन सूर्यों की सम्मिलित शक्ति का नाम आदि सूर्य कहा गया
है। आदिसूर्य से १२ सूर्य उत्पन्न हुए हैं ।
भैरव का सम्बन्ध आदिसूर्य से है । इस प्रकार यह समस्त ब्रह्माण्डों
के सूर्यों के द्वारा उत्पन्न की जा रही रश्मियों का उपयोग करते हैं। अर्थात यह सूर्य रश्मियों के माध्यम से चराचर जगत के जीव – निर्जीव पर अपनी दृष्टि या नियंत्रण रखते हैं । भैरव उपासक जानते हैं कि मध्यान्ह के सूर्य
के चारों ओर भैरव परिक्रमा करते हैं अतः इस समय इनकी उपासना से बचा
जाना चाहिए । । मार्तण्ड स्वरुप ।।
सूर्य की रश्मि आकाश हो या पाताल सर्वत्र पहुंच ही जाती है चाहे
वह सीधे ही प्रवेश करे अथवा मुड कर जाए । अतः भैरव की दृष्टि समस्त
प्राणीयों पर होने के कारण वह समस्त शुभाशुभ फल देते हैं।
इनकी पूर्ण कृपा प्राप्त करने के लिए निम्न बातें आवश्यक हैं :-
१. गुरु उपासना,
२. गुरु की प्रसन्नता,
३. गुरु के प्रति समर्पण,
४. योग क्रिया आदि का अभ्यास,
५. आन्तरिक एवं बाहा शुद्धि
तत्पश्चात गुरु का आर्शीवाद प्राप्त होता है
गुरु शब्द का अर्थ भी व्यापक है । गुरु मुख्य रुप से तीन होते है:-
१. मनुष्य गुरु (ऋषि गुरु)
२. देव गुरु (भैरव)
३. परम गुरु (शिव)
कोई भी मंत्र हो इसका ऋषि होता है फिर शक्ति (देव गुरु) होती है।
तत्पश्चात पूर्णता परमगुरु या शिव में होती है। शिव ही मोक्षपद है,
परमधाम है या परमब्रह्म है ।शिव के नाम की व्याख्या भी बहुत ही व्यापक
है।
जैसे :- १. शिव ५. रुद्र
२. शिव-शक्ति ६. भैरव
३. शंकर ७. गण इत्यादि
४. महेश ८. शिव से अन्य देव-दवियों की
उत्पति ।
शिवपुराण के अध्ययन से उपरोक्त शंकाएं मिट जाती हैं । शिव का
योगिक अर्थ एक बिन्द या चिन्ह से है जो समय पर सिकुड जाता है और आवश्यकता पडने पर लम्बा हो जाता है । अर्थात यह एक लिंग के समान
है। इसमें सृष्टि और लय करने की शक्ति है । शिव जब शक्ति रुप के साथ
जाने जाते हैं तब यह गायत्री रुप होते है । जैसे :-
१. ब्रह्मा + सरस्वती = प्रातः गायत्री
२. विष्णु + लक्ष्मी = मध्यान्ह गायत्री
३. शिव + पार्वती = सायंकालीन गायत्री
शिव की शक्ति ही सामान्य रुप से भैरव कही जाती है तथा गुरु के
क्रमानुसार भी भैरव से साधक की परिणिति शिव (मोक्ष) में होती है।साधक
का लक्ष्य गुरु को माध्यम बनाकर परमगुरु से सम्पर्क स्थापित करना होता
है । तत्पशचात परमगुरु (शिव) साधक को सिद्धता (पूर्णता) प्रदान करते हुऐ
अपना परमब्रह्म स्वरुप प्रगट कर देते हैं अर्थात योग की प्राप्ति हो जाती है।
इस परमपद को प्राप्त करने के लिए ऋषि दुर्वासा के द्वारा जप किया गया सहस्त्रनाम बहुत उपयोगी है । सहस्त्रनाम का पाठ कब और
कैसे किया जाऐगा फलश्रुति में लिखा है ।
दीपदान
कार्यानुसार दीपदान किया जाता है । किन्तु योग की प्राप्ति के
लिए:- दिन :- कोई भी किन्तु शनिवार अथवा बृहस्पतिवार की रात्री शुभ
समय :- कभी भी, किन्तु रात्री ६ से १ बजे शुभ
बत्तीयों की संख्या :- श्रद्धानुसार
वलि :- दही-बडा, इमरती, उडद की दाल का भोग
स्वयं की रक्षार्थ:- भूतादिक,या तंत्र प्रयोग से रक्षा हेतु मदिरा का भोग ।
दीपक – दो दीपक जलेगें :- यह चांदी के होने चाहिए
१. तिल के तेल का प्रयोग करें
२. घी का दीपक भी एक अवश्य जलेगा |
यंत्र :- यदि शुद्ध प्राप्त हो तब ही पूजा करें |
स्तुति :- स्तोत्र पाठ एवं मंत्र जप आवश्यक हैं |
स्वयं की रक्षा के लिए प्रयोग
चराचर जगत में ऐसा कोई स्थान नही है जहां अशुद्ध शक्तियों का
निवास नहीं हो । (दिव्य स्थानों को छोड कर) जब कोई साधक अपने आत्म
कल्याण के लिए प्रयास करता है तो उसके मार्ग में अनावश्यक बाधाएँ
अवश्य आती हैं । यह बाधाएँ निम्न के द्वारा हो सकती हैं।
१. भूत – भूतनी
२. प्रेत – प्रेतनी
३. पिशाच – पिशाचनी
४. ताल
५. वेताल – ब्रह्मराक्षस
६.अन्य विकारयुक्त आत्माएं.
७. किसी व्यक्ति विशेष द्वारा किया गया तांत्रिक प्रयोग
मारण – मोहन – उच्चाटन इत्यादि ।
८. परीक्षात्मक दिव्य शक्ति प्रयोग
६. स्थान आदि का दोष आदि ।
यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति उपरोक्त कारणो से अपनी
रक्षा करपाने में समर्थ हो । यह देखा गया है कि प्रत्येक साधक कहीं न
कहीं अपनी साधना में जाने या अनजाने में फंस जाता है तथा वह पूर्ण लक्ष्य
प्राप्त नहीं कर पाता है । यदि उपरोक्त में से कोई कारण साधक के सन्मुख
हो तो निम्न कार्य करे :-
१. गुरु का स्मरण
२. गुरु के प्रति समर्पण
३.गणेश पूजन
४. ऋषि पूजन
५. इष्टदेव स्मरण व पूजन
६. गायत्री मंत्र जप मय सन्ध्या इत्यादि
७. सामर्थ्य के अनुसार प्राणायाम
८. हवन
६. ग्रन्थों का अध्ययन इत्यादि ।
स्वयं पर कितनी ही विपत्ती क्यों न आए अपना पूजा एवं
योग का क्रम न छोड़ें। क्योकि इसी से यह अनुमान लगाया जाता है कि
साधक की वास्तविक स्थिति क्या है ?
भैरव के प्रचलित रुप
सामान्य तयः काल भैरव, महाकाल भैरव की उपासना सर्वाधिक
होती है। यह उपासना भी मुख्य रुप से तामसिक एवं भ्रष्ट तंत्र युक्त होती |
इस प्रकार की साधना आत्मकल्याणकारी नहीं कही जा सकती है।
प्रकार के साधक किसी भी व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने में समर्थ होते हैं। इस प्रकार के प्रयोग से रक्षा करने के लिए – क्रमशः
१. काली उपासना,
२. पीताम्बरा उपासना,
३. गायत्री उपासना अथवा महामृत्युन्जय उपासना श्रेष्ठ रहती है |
गायत्री तंत्र या उपासना सर्वोपरि है ।
४. गुरु की शरण ।
विश्लेषण
इस पुस्तक के माध्यम से यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है
कि भैरव शब्द का जो स्वरुप बनता है वह अग्निपुराण के ५२ वें अध्याय में
लिखा हुआ है । तथा अन्य स्वरुप का वर्णन भैरव शब्द से पहिले नाम
लिखने से होता है जैसे काल भैरव, महाकाल भैरव इत्यादि । समस्त भैरवों
की शक्ति को एकत्रित कर लें तो यह महाभैरव कहा जाता है। महाभैरव
का रुप शिव है तथा महाभैरवी पार्वती है। किन्तु यह पूर्ण सात्विक रुप होता
है अतः इनके वस्त्र परिधान – आसन पुष्प इत्यादि श्वेत होते हैं जैसे महागायत्री के होते हैं। अर्थात महाभैरव + महाभैरवी ही महागायत्री का रुप होता है |
योग में प्रकाश श्वेत होने पर ही फल की प्राप्ति समझी जाती है।
योग में दो या दो से अधिक चीजों का होना आवश्यक है। बिना शक्ति के
इनका मिलन सम्भव नहीं है अर्थात माध्यम कुछ न कुछ अवश्य होना चाहिए
फिर यह मिल जाते हैं । रुप जो बनता है वह ब्रह्म या परमब्रह्म है । यह
ही मोक्ष या आत्म साक्षात्कार है ।
जिस विधि (क्रिया) से यह मिलन या परमपद की प्राप्ति होती है वह
कुण्डलिनी योग कहा जाता है ।
गुरवे नमः
पठनीय शास्त्र –
१. शिव पुराण
२. देवी भागवत
३. श्रीवटुकभैरवोपासनाऽध्याय: १२४
(खेमराज श्रीकृष्णदास)
ॐ
